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सम्पूर्ण विवाह विधि — गणेश पूजन, मंडप, कन्यादान, सप्तपदी एवं फेरे।
विवाह सोलह संस्कारों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है — दो व्यक्तियों ही नहीं, दो परिवारों का मिलन। वैदिक मंत्रों के साथ अग्नि को साक्षी मानकर लिए गए सात वचन इस बंधन को जीवन भर का संकल्प बनाते हैं।
गणेश पूजन एवं मंडप निर्माण से आरंभ होकर मातृका पूजन, हल्दी, वरमाला, कन्यादान, पाणिग्रहण, लाजा होम, सप्तपदी एवं सिंदूरदान तक समस्त विधि शास्त्रोक्त रूप से संपन्न कराई जाती है। प्रत्येक चरण का अर्थ भी परिवार को समझाया जाता है।
मंडप, हवन कुंड, वर-वधू के वस्त्र, मंगलसूत्र, सिंदूर, हल्दी, अक्षत, सप्तधान्य एवं विस्तृत हवन सामग्री। इतनी बड़ी विधि के लिए सामग्री सूची पहले ही साझा कर दी जाती है।
विवाह के लिए पंचांग से लग्न मुहूर्त निकाला जाता है — देवउठनी एकादशी के बाद का काल विशेष शुभ है। चातुर्मास एवं खरमास में विवाह वर्जित है। तिथि तय करने से पहले पंडित जी से परामर्श अवश्य करें।
लगभग 4-6 घंटे।