मंगल, काल सर्प, पितृ दोष और साढ़े साती — है या नहीं, और क्यों।
मंगल दोष (मांगलिक) — लग्न, चंद्र और शुक्र से मंगल की स्थिति; काल सर्प दोष — सभी ग्रह राहु-केतु के एक ओर; पितृ दोष — सूर्य के साथ राहु या केतु, अथवा नवम भाव में राहु या केतु; और शनि की साढ़े साती — चंद्र राशि से शनि का गोचर।
अधिकतर दोषों के परिहार भी कुंडली में ही होते हैं, और कई बार दोष आंशिक होता है। परिणाम में कारण लिखा आता है; उपाय या शांति पूजा का निर्णय किसी ज्योतिषी जी से बात करके ही लें।
जब मंगल लग्न, चंद्र या शुक्र से 1, 2, 4, 7, 8 या 12वें भाव में हो तो मांगलिक दोष माना जाता है। दोनों वर-वधू मांगलिक हों तो परंपरा में यह दोष कट जाता है।
काल सर्प दोष शांति पूजा घर पर या किसी सिद्ध स्थान पर कराई जाती है। घर पर कराने के लिए पंडित जी बुक कर सकते हैं।
शनि एक राशि में लगभग ढाई वर्ष रहते हैं; चंद्र राशि से पहले, उसी और अगली राशि में गोचर मिलाकर लगभग साढ़े सात वर्ष।